tithika
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Ipameri, गोइयास, ब्राज़िल में देवशयनी एकादशी 1902 पारण समय 11:44⁠–⁠17:53, बुध 16 जुलाई

व्रत · समय UTC−3 में

Ipameri में देवशयनी एकादशी 1902 कब है?

मंगलवार 15 जुलाई

आषाढ़ शुक्ल एकादशी

स्मार्त · वैष्णव

Ipameri में मंगल 15 जुलाई का पूरा पंचांग

पारण का समय: व्रत कब खोलें?

बुधवार 16 जुलाई

पारण समय
11:44–17:53
6 घं 9 मि · Tithika की परिपाटी

देवशयनी एकादशी का समय: व्रत, पारण

  • मंगलवार 15 जुलाई
  • 06:43व्रत आरंभसूर्योदय पर
  • बुधवार 16 जुलाई
  • 11:44–17:53पारण समयव्रत खोलने का समय · Tithika की परिपाटी
Tithika में खोलेंदेवशयनी एकादशी की तारीख़ अपने हर स्थान में देखें, साथ-साथ।

Ipameri में देवशयनी एकादशी मंगल 15 जुलाई को क्यों है?

देवशयनी एकादशी मंगल 15 जुलाई को है: उस दिन सूर्योदय पर और पूरे अरुणोदय में एकादशी है।

पूरे अरुणोदय में और सूर्योदय पर एकादशी। एकादशी: 02:31 से 05:01 बुध तक।

एकादशी 05:01 पर समाप्त; अरुणोदय में द्वादशी। एकादशी: 02:31 मंगल से 05:01 तक।

हर पंक्ति एक दिन, एक ही घड़ी पर (UTC−3)। पट्टी: तिथि। खाना: अरुणोदय। हल्की पट्टी: दिन; गहरी: रात। सूर्य: सूर्योदय।

स्मार्त एकादशी को सूर्योदय पर देखते हैं: यह केवल मंगल 15 जुलाई को सूर्योदय पर है, 06:37: मंगल 15 जुलाई। वैष्णव अरुणोदय देखते हैं: दशमी 02:31 पर, उससे (05:01–06:37) पहले, समाप्त हुई।

व्रत का पारण

स्मार्त · वैष्णव · बुध 16 जुलाई, 11:44–17:53 (सूर्यास्त, Tithika की परिपाटी)

पारण द्वादशी में होता है, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले। द्वादशी बुध 16 जुलाई 05:01 से गुरु 17 जुलाई 07:30 तक है; हरिवासर 11:38 पर पूरा होता है। पारण दिन का कर्म है, इसलिए Tithika सूर्यास्त (17:47) पर समय समाप्त करता है: Tithika की परिपाटी। द्वादशी दोपहर के बाद तक है: धर्मसिंधु के अनुसार बहुत लोग पारण सूर्योदय के बाद के पहले 3 मुहूर्तों में, 08:51 तक, करते हैं; यहाँ यह समय हरिवासर से पहले समाप्त हो जाता है।

नियम

आषाढ़ शुक्ल एकादशी

एकादशी व्रत सूर्योदय से अगले दिन के पारण तक रहता है।

स्मार्त
सूर्योदय पर एकादशी; दो सूर्योदयों पर हो तो पहला दिन, या द्वादशी भी बढ़े तो दूसरा; किसी सूर्योदय पर न हो तो वह दिन जब वह चल रही हो (निर्णयसिंधु)।
वैष्णव
पूरे अरुणोदय में एकादशी, सूर्योदय से पहले के 96 मिनट, जिसे दशमी विद्ध न करे; दो सूर्योदयों पर हो तो दूसरा दिन।
व्रत का पारण
द्वादशी में, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद।