tithika
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Ipameri, गोइयास, ब्राज़िल में देवउठनी एकादशी 1997 पारण समय 06:30⁠–⁠19:23, मंगल 11 नवंबर

व्रत · समय UTC−2 में · इसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं

Ipameri में देवउठनी एकादशी 1997 कब है?

सोमवार 10 नवंबर

कार्तिक शुक्ल एकादशी

स्मार्त · वैष्णव

Ipameri में सोम 10 नवंबर का पूरा पंचांग

पारण का समय: व्रत कब खोलें?

मंगलवार 11 नवंबर

पारण समय
06:30–19:23
12 घं 53 मि · Tithika की परिपाटी

देवउठनी एकादशी का समय: व्रत, पारण

  • सोमवार 10 नवंबर
  • 06:30व्रत आरंभसूर्योदय पर
  • मंगलवार 11 नवंबर
  • 06:30–19:23पारण समयव्रत खोलने का समय · Tithika की परिपाटी
Tithika में खोलेंदेवउठनी एकादशी की तारीख़ अपने हर स्थान में देखें, साथ-साथ।

Ipameri में देवउठनी एकादशी सोम 10 नवंबर को क्यों है?

देवउठनी एकादशी सोम 10 नवंबर को है: उस दिन सूर्योदय पर और पूरे अरुणोदय में एकादशी है।

पूरे अरुणोदय में और सूर्योदय पर एकादशी। एकादशी: 02:33 से 23:53 तक।

एकादशी 23:53 सोम पर समाप्त; अरुणोदय में द्वादशी।

हर पंक्ति एक दिन, एक ही घड़ी पर (UTC−2)। पट्टी: तिथि। खाना: अरुणोदय। हल्की पट्टी: दिन; गहरी: रात। सूर्य: सूर्योदय।

स्मार्त एकादशी को सूर्योदय पर देखते हैं: यह केवल सोम 10 नवंबर को सूर्योदय पर है, 06:30: सोम 10 नवंबर। वैष्णव अरुणोदय देखते हैं: दशमी 02:33 पर, उससे (04:54–06:30) पहले, समाप्त हुई।

व्रत का पारण

स्मार्त · वैष्णव · मंगल 11 नवंबर, 06:30–19:23 (सूर्यास्त, Tithika की परिपाटी)

पारण द्वादशी में होता है, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले। द्वादशी सोम 10 नवंबर 23:53 से मंगल 11 नवंबर 21:00 तक है; हरिवासर 05:10 पर पूरा होता है। इसलिए पारण मंगल 11 नवंबर को सूर्योदय (06:30) से होता है। पारण दिन का कर्म है, इसलिए Tithika सूर्यास्त (19:23) पर समय समाप्त करता है: Tithika की परिपाटी। द्वादशी दोपहर के बाद तक है: धर्मसिंधु के अनुसार बहुत लोग पारण सूर्योदय के बाद के पहले 3 मुहूर्तों में, 09:04 तक, करते हैं।

नियम

कार्तिक शुक्ल एकादशी

एकादशी व्रत सूर्योदय से अगले दिन के पारण तक रहता है।

स्मार्त
सूर्योदय पर एकादशी; दो सूर्योदयों पर हो तो पहला दिन, या द्वादशी भी बढ़े तो दूसरा; किसी सूर्योदय पर न हो तो वह दिन जब वह चल रही हो (निर्णयसिंधु)।
वैष्णव
पूरे अरुणोदय में एकादशी, सूर्योदय से पहले के 96 मिनट, जिसे दशमी विद्ध न करे; दो सूर्योदयों पर हो तो दूसरा दिन।
व्रत का पारण
द्वादशी में, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद।