tithika
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Ipameri, गोइयास, ब्राज़िल में जया एकादशी 1909 पारण समय 06:00⁠–⁠18:52, सोम 1 फ़रवरी

व्रत · समय UTC−3 में

Ipameri में जया एकादशी 1909 कब है?

रविवार 31 जनवरी

माघ शुक्ल एकादशी

स्मार्त · वैष्णव

Ipameri में रवि 31 जनवरी का पूरा पंचांग

पारण का समय: व्रत कब खोलें?

सोमवार 1 फ़रवरी

पारण समय
06:00–18:52
12 घं 52 मि · Tithika की परिपाटी

जया एकादशी का समय: व्रत, पारण

  • रविवार 31 जनवरी
  • 05:59व्रत आरंभसूर्योदय पर
  • सोमवार 1 फ़रवरी
  • 06:00–18:52पारण समयव्रत खोलने का समय · Tithika की परिपाटी
Tithika में खोलेंजया एकादशी की तारीख़ अपने हर स्थान में देखें, साथ-साथ।

Ipameri में जया एकादशी रवि 31 जनवरी को क्यों है?

जया एकादशी रवि 31 जनवरी को है: उस दिन सूर्योदय पर और पूरे अरुणोदय में एकादशी है।

पूरे अरुणोदय में और सूर्योदय पर एकादशी। एकादशी: 22:46 शनि से 23:15 तक।

एकादशी 23:15 रवि पर समाप्त; अरुणोदय में द्वादशी।

हर पंक्ति एक दिन, एक ही घड़ी पर (UTC−3)। पट्टी: तिथि। खाना: अरुणोदय। हल्की पट्टी: दिन; गहरी: रात। सूर्य: सूर्योदय।

स्मार्त एकादशी को सूर्योदय पर देखते हैं: यह केवल रवि 31 जनवरी को सूर्योदय पर है, 05:53: रवि 31 जनवरी। वैष्णव अरुणोदय देखते हैं: दशमी 22:46 शनि पर, उससे (04:17–05:53) पहले, समाप्त हुई।

व्रत का पारण

स्मार्त · वैष्णव · सोम 1 फ़रवरी, 06:00–18:52 (सूर्यास्त, Tithika की परिपाटी)

पारण द्वादशी में होता है, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले। द्वादशी रवि 31 जनवरी 23:15 से मंगल 2 फ़रवरी 00:13 तक है; हरिवासर 05:30 पर पूरा होता है। इसलिए पारण सोम 1 फ़रवरी को सूर्योदय (05:53) से होता है। पारण दिन का कर्म है, इसलिए Tithika सूर्यास्त (18:46) पर समय समाप्त करता है: Tithika की परिपाटी। द्वादशी दोपहर के बाद तक है: धर्मसिंधु के अनुसार बहुत लोग पारण सूर्योदय के बाद के पहले 3 मुहूर्तों में, 08:28 तक, करते हैं।

नियम

माघ शुक्ल एकादशी

एकादशी व्रत सूर्योदय से अगले दिन के पारण तक रहता है।

स्मार्त
सूर्योदय पर एकादशी; दो सूर्योदयों पर हो तो पहला दिन, या द्वादशी भी बढ़े तो दूसरा; किसी सूर्योदय पर न हो तो वह दिन जब वह चल रही हो (निर्णयसिंधु)।
वैष्णव
पूरे अरुणोदय में एकादशी, सूर्योदय से पहले के 96 मिनट, जिसे दशमी विद्ध न करे; दो सूर्योदयों पर हो तो दूसरा दिन।
व्रत का पारण
द्वादशी में, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद।