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Pāthardi, महाराष्ट्र में देवशयनी एकादशी 1982 पारण समय 09:51⁠–⁠19:11, शुक्र 2 जुलाई

महाराष्ट्र, भारत

व्रत · समय IST में

Pāthardi में देवशयनी एकादशी 1982 कब है?

गुरुवार 1 जुलाई

आषाढ़ शुक्ल एकादशी

स्मार्त · वैष्णव

Pāthardi में गुरु 1 जुलाई का पूरा पंचांग

पारण का समय: व्रत कब खोलें?

शुक्रवार 2 जुलाई

पारण समय
09:51–19:11
9 घं 20 मि · Tithika की परिपाटी

देवशयनी एकादशी का समय: व्रत, पारण

  • गुरुवार 1 जुलाई
  • 05:54व्रत आरंभसूर्योदय पर
  • शुक्रवार 2 जुलाई
  • 09:51–19:11पारण समयव्रत खोलने का समय · Tithika की परिपाटी
Tithika में खोलेंदेवशयनी एकादशी की तारीख़ अपने हर स्थान में देखें, साथ-साथ।

Pāthardi में देवशयनी एकादशी गुरु 1 जुलाई को क्यों है?

देवशयनी एकादशी गुरु 1 जुलाई को है: उस दिन सूर्योदय पर और पूरे अरुणोदय में एकादशी है।

पूरे अरुणोदय में और सूर्योदय पर एकादशी। एकादशी: 01:29 से 03:18 शुक्र तक।

एकादशी 03:18 पर समाप्त; अरुणोदय में द्वादशी। एकादशी: 01:29 गुरु से 03:18 तक।

हर पंक्ति एक दिन, एक ही घड़ी पर (IST)। पट्टी: तिथि। खाना: अरुणोदय। हल्की पट्टी: दिन; गहरी: रात। सूर्य: सूर्योदय।

स्मार्त एकादशी को सूर्योदय पर देखते हैं: यह केवल गुरु 1 जुलाई को सूर्योदय पर है, 05:54: गुरु 1 जुलाई। वैष्णव अरुणोदय देखते हैं: दशमी 01:29 पर, उससे (04:18–05:54) पहले, समाप्त हुई।

व्रत का पारण

स्मार्त · वैष्णव · शुक्र 2 जुलाई, 09:51–19:11 (सूर्यास्त, Tithika की परिपाटी)

पारण द्वादशी में होता है, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले। द्वादशी शुक्र 2 जुलाई 03:18 से शनि 3 जुलाई 05:30 तक है; हरिवासर 09:51 पर पूरा होता है। पारण दिन का कर्म है, इसलिए Tithika सूर्यास्त (19:11) पर समय समाप्त करता है: Tithika की परिपाटी। द्वादशी दोपहर के बाद तक है: धर्मसिंधु के अनुसार बहुत लोग पारण सूर्योदय के बाद के पहले 3 मुहूर्तों में, 08:34 तक, करते हैं; यहाँ यह समय हरिवासर से पहले समाप्त हो जाता है।

नियम

आषाढ़ शुक्ल एकादशी

एकादशी व्रत सूर्योदय से अगले दिन के पारण तक रहता है।

स्मार्त
सूर्योदय पर एकादशी; दो सूर्योदयों पर हो तो पहला दिन, या द्वादशी भी बढ़े तो दूसरा; किसी सूर्योदय पर न हो तो वह दिन जब वह चल रही हो (निर्णयसिंधु)।
वैष्णव
पूरे अरुणोदय में एकादशी, सूर्योदय से पहले के 96 मिनट, जिसे दशमी विद्ध न करे; दो सूर्योदयों पर हो तो दूसरा दिन।
व्रत का पारण
द्वादशी में, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद।