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Pāthardi, महाराष्ट्र में देवशयनी एकादशी 1921 पारण समय 05:59⁠–⁠19:10, शनि 16 जुलाई

महाराष्ट्र, भारत

व्रत · समय IST में

Pāthardi में देवशयनी एकादशी 1921 कब है?

शुक्रवार 15 जुलाई

आषाढ़ शुक्ल एकादशी

स्मार्त · वैष्णव

Pāthardi में शुक्र 15 जुलाई का पूरा पंचांग

पारण का समय: व्रत कब खोलें?

शनिवार 16 जुलाई

पारण समय
05:59–19:10
13 घं 11 मि · Tithika की परिपाटी

देवशयनी एकादशी का समय: व्रत, पारण

  • शुक्रवार 15 जुलाई
  • 05:59व्रत आरंभसूर्योदय पर
  • शनिवार 16 जुलाई
  • 05:59–19:10पारण समयव्रत खोलने का समय · Tithika की परिपाटी
Tithika में खोलेंदेवशयनी एकादशी की तारीख़ अपने हर स्थान में देखें, साथ-साथ।

Pāthardi में देवशयनी एकादशी शुक्र 15 जुलाई को क्यों है?

देवशयनी एकादशी शुक्र 15 जुलाई को है: उस दिन सूर्योदय पर और पूरे अरुणोदय में एकादशी है।

पूरे अरुणोदय में और सूर्योदय पर एकादशी। एकादशी: 21:35 गुरु से 22:30 तक।

एकादशी 22:30 शुक्र पर समाप्त; अरुणोदय में द्वादशी।

हर पंक्ति एक दिन, एक ही घड़ी पर (IST)। पट्टी: तिथि। खाना: अरुणोदय। हल्की पट्टी: दिन; गहरी: रात। सूर्य: सूर्योदय।

स्मार्त एकादशी को सूर्योदय पर देखते हैं: यह केवल शुक्र 15 जुलाई को सूर्योदय पर है, 05:59: शुक्र 15 जुलाई। वैष्णव अरुणोदय देखते हैं: दशमी 21:35 गुरु पर, उससे (04:23–05:59) पहले, समाप्त हुई।

व्रत का पारण

स्मार्त · वैष्णव · शनि 16 जुलाई, 05:59–19:10 (सूर्यास्त, Tithika की परिपाटी)

पारण द्वादशी में होता है, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले। द्वादशी शुक्र 15 जुलाई 22:30 से शनि 16 जुलाई 23:50 तक है; हरिवासर 04:50 पर पूरा होता है। इसलिए पारण शनि 16 जुलाई को सूर्योदय (05:59) से होता है। पारण दिन का कर्म है, इसलिए Tithika सूर्यास्त (19:10) पर समय समाप्त करता है: Tithika की परिपाटी। द्वादशी दोपहर के बाद तक है: धर्मसिंधु के अनुसार बहुत लोग पारण सूर्योदय के बाद के पहले 3 मुहूर्तों में, 08:37 तक, करते हैं।

नियम

आषाढ़ शुक्ल एकादशी

एकादशी व्रत सूर्योदय से अगले दिन के पारण तक रहता है।

स्मार्त
सूर्योदय पर एकादशी; दो सूर्योदयों पर हो तो पहला दिन, या द्वादशी भी बढ़े तो दूसरा; किसी सूर्योदय पर न हो तो वह दिन जब वह चल रही हो (निर्णयसिंधु)।
वैष्णव
पूरे अरुणोदय में एकादशी, सूर्योदय से पहले के 96 मिनट, जिसे दशमी विद्ध न करे; दो सूर्योदयों पर हो तो दूसरा दिन।
व्रत का पारण
द्वादशी में, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद।