Ipameri, गोइयास, ब्राज़िल में सफला एकादशी 1940 1940 में 2 तारीख़ें
व्रत · समय UTC−3 में
Ipameri में सफला एकादशी 1940 कब है?
1940 में दो बार
शुक्रवार 5 जनवरी
पौष कृष्ण एकादशी (पूर्णिमान्त) · मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी (अमान्त)
Ipameri में शुक्र 5 जनवरी का पूरा पंचांगस्मार्त
मंगलवार 24 दिसंबर
वैष्णव
बुधवार 25 दिसंबर
पौष कृष्ण एकादशी (पूर्णिमान्त) · मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी (अमान्त)
Ipameri में मंगल 24 दिसंबर का पूरा पंचांगपारण का समय: व्रत कब खोलें?
शनिवार 6 जनवरी
स्मार्त · बुधवार 25 दिसंबर
वैष्णव · गुरुवार 26 दिसंबर
सफला एकादशी का समय: व्रत, पारण
शुक्र 5 जनवरी
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05:43व्रत आरंभसूर्योदय पर
- शनिवार 6 जनवरी
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05:43–09:42पारण समयव्रत खोलने का समय
मंगल 24 दिसंबर
स्मार्त
- मंगलवार 24 दिसंबर
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05:36व्रत आरंभसूर्योदय पर
- बुधवार 25 दिसंबर
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08:31–18:48पारण समयव्रत खोलने का समय · Tithika की परिपाटी
वैष्णव
- बुधवार 25 दिसंबर
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05:37व्रत आरंभसूर्योदय पर
- गुरुवार 26 दिसंबर
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05:37–18:49पारण समयव्रत खोलने का समय · Tithika की परिपाटी
सफला एकादशी इन तारीख़ों पर क्यों है?
चांद्र तिथि हर साल लगभग 11 दिन पहले आती है, जब तक कोई अधिक मास उसे फिर आगे न कर दे। जनवरी के शुरू में पड़ने वाली तिथि पिछले दिसंबर में जा सकती है, इसलिए किसी वर्ष में दो बार और अगले में एक बार भी नहीं।
शुक्र 5 जनवरी क्यों?
सफला एकादशी शुक्र 5 जनवरी को है: उस दिन सूर्योदय पर और पूरे अरुणोदय में एकादशी है।
पूरे अरुणोदय में और सूर्योदय पर दशमी; एकादशी 10:43 से।
पूरे अरुणोदय में और सूर्योदय पर एकादशी। एकादशी: 10:43 गुरु से 10:03 तक।
हर पंक्ति एक दिन, एक ही घड़ी पर (UTC−3)। पट्टी: तिथि। खाना: अरुणोदय। हल्की पट्टी: दिन; गहरी: रात। सूर्य: सूर्योदय।
स्मार्त एकादशी को सूर्योदय पर देखते हैं: यह केवल शुक्र 5 जनवरी को सूर्योदय पर है, 05:43: शुक्र 5 जनवरी। वैष्णव अरुणोदय देखते हैं: दशमी 10:43 गुरु पर, उससे (04:07–05:43) पहले, समाप्त हुई।
व्रत का पारण
स्मार्त · वैष्णव · शनि 6 जनवरी, 05:43–09:42
पारण द्वादशी में होता है, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले। द्वादशी शुक्र 5 जनवरी 10:03 से शनि 6 जनवरी 09:42 तक है; हरिवासर 15:57 शुक्र पर पूरा होता है। इसलिए पारण शनि 6 जनवरी को सूर्योदय (05:43) से होता है।
मंगल 24 दिसंबर और बुध 25 दिसंबर क्यों?
स्मार्त · स्मार्त परंपरा में सफला एकादशी मंगल 24 दिसंबर को है: उस दिन सूर्योदय पर एकादशी है। वैष्णव बुध 25 दिसंबर को व्रत रखते हैं।
दशमी 05:31 तक, अरुणोदय के भीतर; सूर्योदय पर एकादशी। एकादशी: 05:31 से 03:08 बुध तक।
एकादशी 03:08 पर समाप्त; अरुणोदय में द्वादशी। एकादशी: 05:31 मंगल से 03:08 तक।
हर पंक्ति एक दिन, एक ही घड़ी पर (UTC−3)। पट्टी: तिथि। खाना: अरुणोदय। हल्की पट्टी: दिन; गहरी: रात। सूर्य: सूर्योदय।
स्मार्त एकादशी को सूर्योदय पर देखते हैं: यह केवल मंगल 24 दिसंबर को सूर्योदय पर है, 05:36: मंगल 24 दिसंबर।
वैष्णव अरुणोदय देखते हैं, सूर्योदय से पहले के 96 मिनट। मंगल 24 दिसंबर को दशमी 05:31 तक है, अरुणोदय (04:00–05:36) के भीतर, इसलिए वह एकादशी विद्ध है। एकादशी 03:08 पर समाप्त होती है, इसलिए वैष्णव बुध 25 दिसंबर को व्रत रखते हैं: बुध 25 दिसंबर।
व्रत का पारण
स्मार्त · बुध 25 दिसंबर, 08:31–18:48 (सूर्यास्त, Tithika की परिपाटी)
पारण द्वादशी में होता है, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले। द्वादशी बुध 25 दिसंबर 03:08 से गुरु 26 दिसंबर 00:39 तक है; हरिवासर 08:31 पर पूरा होता है। पारण दिन का कर्म है, इसलिए Tithika सूर्यास्त (18:48) पर समय समाप्त करता है: Tithika की परिपाटी। द्वादशी दोपहर के बाद तक है: धर्मसिंधु के अनुसार बहुत लोग पारण सूर्योदय के बाद के पहले 3 मुहूर्तों में, 08:15 तक, करते हैं; यहाँ यह समय हरिवासर से पहले समाप्त हो जाता है।
वैष्णव · गुरु 26 दिसंबर, 05:37–18:49 (त्रयोदशी, सूर्योदय से सूर्यास्त: Tithika की परिपाटी)
द्वादशी गुरु 26 दिसंबर को 00:39 पर, रात में, अरुणोदय (04:01) से पहले समाप्त होती है: रात में समाप्त द्वादशी को Tithika नहीं गिनता, उसकी परिपाटी। द्वादशी न हो तो निर्णयसिंधु पारण त्रयोदशी में कराता है: सूर्योदय (05:37) से सूर्यास्त (18:49) तक, क्योंकि पारण दिन का कर्म है: Tithika की परिपाटी।
नियम
पौष कृष्ण एकादशी (पूर्णिमान्त) · मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी (अमान्त)
एकादशी व्रत सूर्योदय से अगले दिन के पारण तक रहता है।
- स्मार्त
- सूर्योदय पर एकादशी; दो सूर्योदयों पर हो तो पहला दिन, या द्वादशी भी बढ़े तो दूसरा; किसी सूर्योदय पर न हो तो वह दिन जब वह चल रही हो (निर्णयसिंधु)।
- वैष्णव
- पूरे अरुणोदय में एकादशी, सूर्योदय से पहले के 96 मिनट, जिसे दशमी विद्ध न करे; दो सूर्योदयों पर हो तो दूसरा दिन।
- व्रत का पारण
- द्वादशी में, उसके पहले चौथाई (हरिवासर) के बाद।